जगजीत सिंह जी की गयी एक बहुत मशहूर गज़ल है , शायद आपको याद हो, देर लगी आने में तुमको...उस ग़ज़ल में एक शेर है :-
झूट है सब तारीख हमेशा अपने को दोहराती है
अच्छा मेरा ख़्वाबे-जवानी थोडा सा दोहराए तो
"शायरी करना तो अभी का शौक है लेकिन शायरी पढना बहुत पुराना.बरसों से अच्छे शायरों को पढता रहा हूँ और ये काम अभी भी बदस्तूर जारी है. इसी शौक की वजह से मैं आपका तारुफ्फ़ नयी नयी किताबों से करवाने का प्रयास करता हूँ. किताबों के आलावा नेट पर भी जहाँ कहीं सम्भावना नज़र आये नज़रें दौड़ाता रहता हूँ. 'अनुभूति' मेरी प्रिय साईट है जिसे 'पूर्णिमा वर्मन' जी चलाती हैं.इस साईट पर हर हफ्ते अंजुमन के तहत नए अशार पढने को मिलते हैं. अपनी इसी खोज के दौरान मैं चंद ऐसी ग़ज़लों से रूबरू हुआ जिन्होंने मुझ पर गहरा असर डाला.
शायर का नाम देखा तो मुझे अनजाना लगा. मुझे अनजान शायरों को पढने में बहुत मजा आता है क्यूंकि आप नहीं जानते की वो कैसे हैं, कैसा लिखते हैं, क्या सोचते हैं याने आपके मन में उनकी कोई पूर्व छवि बनी हुई नहीं होती. आप उन्हें निष्पक्ष हो कर पढ़ते हैं. इसी में मजा आता है. वहीँ अनुभूति की साईट पर उनका परिचय भी दिया हुआ था जिसमें उनकी ग़ज़ल की किताब का जिक्र भी था. अनुभूति से ही उनकी मेल का पता मिला और तुरंत उन्हें पुस्तक भेजने का अनुरोध कर डाला."
जी हाँ आप ठीक समझे जिस शायर का जिक्र ऊपर किया गया है वो हैं जनाब संजय ग्रोवर साहब और जिस शायर का जिक्र मैं अब करने जा रहा हूँ उनका नाम है जनाब 'अनमोल शुक्ल अनमोल'. तारीख़ ने अपने आपको दोहराया या नहीं बताइए ? संजय जी की जगह अनमोल जी से परिचय हो गया बस ये ही परिवर्तन हुआ.
बहुत कम शायर होते हैं जो अपने नाम को सार्थक करते हैं, अनमोल जी उनमें से एक हैं. नाम अनमोल और शायरी भी अनमोल. तो आईये हम आज की पोस्ट में उनकी इस अनमोल शायरी का लुत्फ़ उठाते हैं , जिसे उन्होंने अपनी किताब "दरिया डूब गया" में समेटा है.
